उत्तराखंड मजदूरी करके दो वक्त का गुजारा कर रहे स्वतंत्रता सेनानी के आश्रित

इन्द्र सिंह व चन्द्र सिंह ने लड़ी थी आजादी की लड़ाई 
पच्चीसवें स्वतंत्रता दिवस 1972 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था ताम्रपत्र से सम्मानित 
इन्द्र सिंह को मिला ताम्रपत्र, चन्द्र सिंह वर्ष 1957 में मौत होने के बाद सम्मान करना भूल गई सरकार 
स्वतंत्रता संग्राम के आश्रित रोजगार को लेकर भटक रहे दर-दर 
ना मिला रोजगार और ना मिला सम्मान 
जर्जर भवन में रहते हैं स्वतंत्रता संग्राम के आश्रित 
प्रशासन और शासन से लेकर सरकार ने भी बिसराया

रोहित डिमरी
रुद्रप्रयाग। पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है, मगर जिन लोगों की बदौलत देश आजाद हुआ उनके आश्रित दो वक्त की रोटी भी सही से नहीं खा पा रहे हैं। लोगों के यहां दिहाड़ी और घास काटकर आश्रित अपना गुजारा कर रहे हैं। सरकार से लेकर शासन-प्रशासन के पास आश्रित हाथ जोड़कर रोजगार की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन हासिल में कुछ भी नहीं मिला।

 

देश आजादी ने 71वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है। पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा है। सरकारी स्तर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। देशभक्ति गीत गाये जा रहे हैं और नेतागण स्वतंत्रता सेनानियों की जाबांजी के किस्से सुना रहे हैं, मगर जिन लोगों ने अपनी जान की परवाह किये बगैर देश को आजाद कराया, उनके परिजनों को भुला दिया गया है। आज भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजन दर-दर की टोकरें खाने को मजबूर हैं। दो वक्त की रोटी की जुगत में दिहाड़ी-मजदूरी का कार्य किया जा रहा है। रुद्रप्रयाग जनपद के अन्तर्गत रानीगढ़ पट्टी का अंतिम गांव कोदिमा के दो भाईयों ने देश आजादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। कोदिमा गांव में 151 परिवार निवास करते हैं, जिनमें स्वर्गीय थेव सिंह का परिवार ऐसा है, जिसके दोनों पुत्रों ने स्वंतत्रता संग्राम की लड़ाई लड़कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे।

इसके अलावा गांव में किसी भी परिवार से कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं है। स्वर्गीय थेव सिंह के बड़े पुत्र चन्द्र सिंह और छोटे पुत्र इन्द्र सिंह में दो साल का ही अंतर था। जहां चन्द्र सिंह नेगी वर्ष 1930 में राॅयल गढ़वाल राॅयफल में भर्ती हुए, वहीं इन्द्र सिंह भी अपने बड़े भाई के नक्शे कदम पर चले और 1931 में वे भी गढ़वाल राॅयफल में भर्ती हो गये। चन्द्र सिंह ने 1930 से 1942 तक गढ़वाल राॅयफल में सेवाएं दी। इसके बाद वे सुभाष चन्द्र बोस की सेना आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए। चार साल तक वे आजाद हिन्द फौज में रहे, जिसके बाद वे 1948 में डीएससी में भर्ती हुए। वहीं उनके छोटे भाई इन्द्र सिंह ने 1931 से 1942 तक गढ़वाल राॅयफल में सेवाएं दी। इसके बाद इन्द्र सिंह भी आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए और देश आजादी के बाद अपने घर को लौट आये।

इस बीच वर्ष 1957 में तबियत बिगड़ने के कारण चन्द्र सिंह की मौत हो गई और पूरे क्षेत्र में मातम छा गया। इसके बाद जब 15 अगस्त 1972 में देश के भीतर 25वां स्वतंत्रता दिवस मनाया गया तो प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की ओर से आजादी में योगदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र और शाॅल भेंट कर सम्मानित किया गया, मगर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय चन्द्र सिंह को कोई भी सम्मान नहीं मिला। उनकी पत्नी राधा देवी को दुख इस बात का रहा कि उनके पति स्वर्गीय चन्द्र सिंह की वर्ष 1957 में मौत होने के बाद सरकार उन्हें भूल गई, जबकि स्वर्गीय चन्द्र सिंह के छोटे भाई इन्द्र सिंह को ताम्रपत्र के साथ ही अन्य सभी सुविधाएं प्रदान की गई।

स्वर्गीय चन्द्र सिंह की पत्नी राधा देवी ने सरकार से अपने पति के सम्मान की लड़ाई लड़ी और उनके सभी दस्तावेजों को लेकर सरकार से अपने हक की लड़ाई लड़ती रही। अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए सरकार की ओर से वर्ष 1980 में राधा देवी की पेंशन लगाई गई, लेकिन यह पेंशन भी महज चार सालों तक ही मिली। इसके बाद कुछ सालों में राधा देवी का भी निधन हो गया। स्वर्गीय चन्द्र सिंह के पुत्र कुंवर सिंह भी अपने पिता के सम्मान की लड़ाई के लिए लड़ते रहे और आखिर 62 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने दम तोड़ दिया। इसके बाद स्वर्गीय चन्द्र सिंह के पौत्र पुष्कर सिंह को जब अपने दादा के आजादी से पूर्व से लेकर स्वतंत्रता सेनानी के दस्तावेज मिले तो उन्होंने भी अपने हक की लड़ाई लड़ने की ठान ली। वर्ष 2002 से पुष्कर अपने दादा के दस्तावेजों के साथ सरकार, शासन व प्रशासन की चैखट में जाकर सम्मान और रोजगार की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी किसी ने भी कोई सुध नहीं ली है। जिला प्रशासन की ओर से गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, लेकिन चन्द्र सिंह व इन्द्र सिंह के आश्रितों कोई न्यौता नहीं भेजा जाता है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों का सम्मान करना भी शायद प्रशासन भूल गया है।
मेरे दादाजी चन्द्र सिंह और इन्द्र सिंह ने आजादी की लड़ाई लड़कर देश को आजाद कराने में अपना अहम योगदान दिया।

सरकार की ओर से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों के लिए कई घोषणाएं की गई, मगर हकीकत हमे देखकर लगाई जा सकती है। वर्ष 2002 से अपने दादा जी स्वर्गीय चन्द्र सिंह के सम्मान की लड़ाई लड़ रहा हूॅं। सरकार की ओर से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों को कोई रोजगार नहीं दिया जा रहा है। यहां तक की गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भी याद नहीं किया जा रहा है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, गढ़वाल संासद, विधायक, जिलाधिकारी से लेकर निचले स्तर तक के अधिकारी के आगे झुक गया हूॅं, मगर फिर भी उम्मीद की कोई किरण नहीं जगी है। मैं और मेरा छोटा भाई मातबर सिंह पढ़े-लिखे हैं और रोजगार के लिए भटक रहे हैं। किसी तरह दिहाड़ी-मजदूरी करने के बाद दो वक्त की रोटी का गुजारा हो रहा है। घर के भवन की हालत भी नाजुक बनी हुई है। पता नहीं कब आवासीय भवन भी आपदा की भेंट चढ़ जाय, कहा नहीं जा सकता।
पुष्कर सिंह
आश्रित, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

कोदिमा गांव के दो भाईयों ने देश आजादी में अपना सहयोग दिया, बावजूद इसके उनके आश्रितों की ओर किसी का ध्यान नहीं है। गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों के लिए बड़ी-बड़ी बातें और दावें किये जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनके आश्रितों को कोई पूछने वाला भी नहीं है। सरकार की ओर से उनके आश्रितों को रोजगार दिये जाने के साथ ही गांव का भी विकास किया जाना चाहिए था। गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य की कोई भी सुविधा नहीं है। सरकार के दावों से ग्रामीण भी परेशान हो चुके हैं।
छतर सिंह, खुशाल सिंह, ग्रामीण

स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का चयन वर्ष 1970 में किया गया। उनके आश्रितों को सरकार की ओर से सुविधाएं दी जा रही हैं। अगर कोदिमा गांव के दो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों को सरकारी सेवाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है तो मामले में जांच की जायेगी। आश्रितों के पास अगर सेनानियों के ताम्रपत्र और दस्तावेज हैं तो उन्हें सरकारी सुविधा का लाभ दिये जाने के प्रयास किये जायेंगे।
मंगेश घिल्डियाल
जिलाधिकारी

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